उम्मीदों का सैलाब और फिर वो ‘शर्मनाक’ मंजर: क्या यही है हमारा न्यू इंडिया?
दिल्ली का प्रगति मैदान और वहां बना भव्य ‘भारत मंडपम’। नज़ारा ऐसा था जिसे देखकर किसी भी हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाए। मौका था ‘India AI Impact Summit 2026’ का, जहाँ चारों तरफ ‘Digital India’ और ‘AI Kranti’ के नारे गूंज रहे थे। हर तरफ चमक-धमक थी, बड़े-बड़े स्क्रीन लगे थे और हवा में एक ही बात थी—कि अब भारत दुनिया का एआई हब बनने जा रहा है।

लेकिन दोस्तों, एक वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर आज मेरा कलम उठाते हुए हाथ कांप रहे हैं और दिल में गहरी ‘शर्मिंदगी’ (Sharmindagi) है। जिस इवेंट को हमें अपनी एआई ‘तरक्की’ (Progress) की मिसाल के तौर पर दुनिया को दिखाना था, वहां नोएडा की गलगोटियाज यूनिवर्सिटी ने एक ऐसा ‘कांड’ कर दिया जिसने हमारी पूरी साख को मटियामेट कर दिया। यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी की गलती नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का कत्ल है जो पूरी दुनिया ने भारत पर दिखाया था। एक सकारात्मक कहानी कैसे चंद घंटों में एक अंतरराष्ट्रीय मज़ाक बन गई, यह देखना वाकई रूह को झकझोर देने वाला है।
वो भव्य मंच: जब दुनिया की नज़रें भारत की ‘अक्ल’ पर थीं
यह समिट कोई गली-मोहल्ले का विज्ञान मेला नहीं था। भारत मंडपम के इस महाकुंभ में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा विशेष रूप से शिरकत करने आए थे। उनके साथ श्रीलंका के राष्ट्रपति और कई अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे, जो भारत को ‘Global South’ के लीडर के रूप में देख रहे थे। ये सभी नेता इस उम्मीद में आए थे कि भारत से एआई की तकनीक सीखकर वे अपने देशों में जागरूकता फैलाएंगे और विकास करेंगे।

यह समिट इतना कामयाब और लोकप्रिय था कि लोगों के भारी उत्साह को देखते हुए सरकार को इसे एक दिन के लिए ‘एक्सटेंड’ (Extend) करना पड़ा। आप कल्पना कीजिए, लाखों लोग, छात्र और शोधकर्ता इस उम्मीद में कतारों में खड़े थे कि वे भारत का भविष्य देखेंगे। Google, Facebook और OpenAI जैसे दिग्गजों के टॉप एआई साइंटिस्ट वहां टहल रहे थे, यह देखने के लिए कि क्या भारत ने वाकई कोई अपना ‘चैट जीपीटी’ जैसा चमत्कार कर दिखाया है।
लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस मंच पर दुनिया के ‘टेक मास्टर्स’ रिसर्च की बात कर रहे हैं, वहां कुछ लोग ‘धोखाधड़ी’ का सामान सजाए बैठे हैं। भारत की ग्लोबल इमेज बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन एक ‘फेक इनोवेशन’ ने सब पर पानी फेर दिया। जब आपके मेहमान दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोग हों, तो वहां ऐसी ‘मूर्खता’ की गुंजाइश ज़ीरो होनी चाहिए थी।

गलगोटियाज का ‘कांड’: सेलो टेप वाला ड्रोन और वो चीनी कुत्ता!
गलगोटियाज यूनिवर्सिटी को इस समिट में एक खास ‘कियोस्क’ (Kiosk) दिया गया था ताकि वे अपने होनहार छात्रों के एआई प्रोजेक्ट्स दिखा सकें। लेकिन वहां जो दिखा, उसे देखकर तो ‘शर्म’ शब्द भी छोटा पड़ जाए। उनके स्टॉल पर दो मुख्य चीजें थीं, जिन्होंने सबका ध्यान खींचा—पर गलत वजहों से।

सबसे पहले बात करते हैं उस ‘ड्रोन’ की जिसे एआई-पावर्ड बताया जा रहा था। आप स्क्रीन पर देखेंगे तो दंग रह जाएंगे—एक मामूली मोटर थी जिसे साधारण ‘सेलो टेप’ से चिपकाकर खड़ा कर दिया गया था। प्रोफेसर साहब बड़े गर्व से दावा कर रहे थे कि यह ड्रोन एआई से चलता है। अरे भाई, हमारे गांवों के छोटे बच्चे खेल-खेल में इससे बेहतर जुगाड़ बना लेते हैं! इसे एआई समिट में रखना ऐसा ही है जैसे किसी फॉर्मूला-1 रेस में लकड़ी का पहिया लेकर पहुंच जाना।
लेकिन असली ‘तमाशा’ तो अभी बाकी था। इस पूरे स्कैम का मुख्य चेहरा बना एक ‘रोबोटिक कुत्ता’ (Robotic Dog)। यह कुत्ता पूरे समिट का स्टार अट्रैक्शन बन गया था। हमारे टेक्नोलॉजी मंत्री अश्विनी वैष्णव जी से लेकर बड़े-बड़े अधिकारियों और विदेशी मेहमानों तक, सब इसे देखकर हैरान हो रहे थे। दावा यह था कि यह गलगोटियाज के छात्रों की दिन-रात की रिसर्च का नतीजा है और यह पूरी तरह एआई पर आधारित है।
सरकार की वाहवाही और फिर सोशल मीडिया का तमाचा
शुरुआत में तो इस ‘इनोवेशन’ ने खूब तालियां बटोरीं। टेक्नोलॉजी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव जी ने इसे लेकर उत्साह में ट्वीट किया, और हमारे देश के सरकारी न्यूज़ नेटवर्क ‘दूरदर्शन’ ने तो बकायदा इसके वीडियो पैकेज चला दिए। न्यूज़ एंकर्स चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि देखिए कैसे भारतीय छात्र अब दुनिया को रास्ता दिखा रहे हैं। पूरी नेशनल मीडिया इसे एक क्रांतिकारी छलांग मान रही थी।

लेकिन सच्चाई छुपती नहीं है, खासकर तब जब पूरी दुनिया की निगाहें आप पर हों। इस पूरे मामले की गहराई को समझने के लिए आप India AI Impact Summit 2026 World Media Reaction देख सकते हैं, जहाँ इस पूरी घटना का पर्दाफाश किया गया है और दिखाया गया है कि कैसे हमारी आंखों में धूल झोंकी गई।
कड़वी सच्चाई का धमाका: ये तो 28 लाख का चीनी खिलौना निकला!
जैसे ही इस ‘चमत्कारी कुत्ते’ की वीडियो इंटरनेट पर वायरल हुई, टेक एक्सपर्ट्स ने इसकी पोल खोल दी। पता चला कि यह कुत्ता न तो गलगोटियाज के छात्रों ने बनाया है और न ही इसमें कोई एआई है। यह असल में एक चीनी कंपनी का प्रोडक्ट है जिसे कोई भी शख्स उनकी वेबसाइट से करीब 28 लाख रुपये देकर खरीद सकता है।

28 लाख रुपये! आप सोचिए, यह एक मध्यमवर्गीय भारतीय की सालों की कमाई या एक लग्जरी कार (जैसे फॉर्च्यूनर की डाउनपेमेंट) की कीमत है। इतना पैसा खर्च करके एक रेडीमेड चीनी रोबोट खरीदा गया और उसे ‘मेड इन इंडिया एआई’ बताकर पेश कर दिया गया। यह केवल एक मैकेनिकल खिलौना था जो प्री-प्रोग्राम्ड तरीके से चलता था, इसमें एआई का नामोनिशान नहीं था। इसे ऐसे पेश करना जैसे भारत ने अपना ‘Perplexity’ बना लिया हो, सीधे तौर पर देश के साथ गद्दारी है।
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दावा बनाम हकीकत (Claim vs. Reality)
नीचे दी गई टेबल को ध्यान से देखिए, आपको समझ आएगा कि झूठ का जाल कितना गहरा बुना गया था:
| गलगोटियाज का दावा (What they claimed) | कड़वी सच्चाई (The Bitter Truth) |
| यह पूरी तरह से विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा लैब में विकसित किया गया है। | यह एक चीनी कंपनी का रेडीमेड प्रोडक्ट है, जिसे सीधे खरीदा गया है। |
| यह कुत्ता पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित है। | इसमें कोई AI नहीं है, यह सिर्फ एक साधारण मैकेनिकल रोबोटिक मैकेनिज्म है। |
| यह वर्षों की कड़ी रिसर्च और इनोवेशन का नतीजा है। | यह सिर्फ 28 लाख रुपये खर्च करके ‘शॉर्टकट’ से लाई गई चीज़ है। |
| यह भारत की एआई शक्ति का प्रदर्शन है। | यह चीनी तकनीक को ‘अपना’ बताकर दुनिया को धोखा देने का प्रयास है। |
वर्ल्ड मीडिया में ‘फजीहत’: जब चीन के बॉट्स ने उड़ाया मज़ाक
जैसे ही यह खबर अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुंची, भारत की छवि पूरी दुनिया में ‘हंसी का पात्र’ (Laughing stock) बन गई। ‘The New York Times’ और ‘The Washington Post’ जैसे अखबारों ने हेडलाइंस लगाईं कि कैसे भारत के सबसे बड़े एआई समिट में ‘फर्जी एआई’ के जरिए विदेशी मेहमानों को स्कैम किया गया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने तो यहां तक लिख दिया—”India’s AI Dreams Stumble on a Plastic Dog.”

सबसे ज्यादा दुख तब होता है जब दुश्मन देश को मज़ाक उड़ाने का मौका मिल जाए। ट्विटर और फेसबुक पर चीनी ‘बॉट्स’ और यूज़र्स भारत का बुरी तरह मज़ाक उड़ा रहे हैं। वे कह रहे हैं, “भारत एआई में ज़ीरो है, वे हमारी ही तकनीक को अपना बताकर दुनिया को ठग रहे हैं।” जिस समिट को भारत की प्रतिष्ठा बढ़ानी थी, उसकी वजह से आज हमें दुनिया के सामने नीचा देखना पड़ रहा है। यह हमारी राष्ट्रीय गरिमा पर एक बहुत बड़ा धब्बा है।
यूनिवर्सिटी का ‘झूठा’ बचाव और वो खोखली माफ़ी
जब चारों तरफ से थू-थू होने लगी, तो गलगोटियाज यूनिवर्सिटी ने पहले तो इसे डिफेंड करने की कोशिश की। उन्होंने बेशर्मी से कहा कि “हमने कब कहा कि यह हमारा है? हम तो बस इसे दिखा रहे थे।” लेकिन इन ‘मूर्खों’ से कोई पूछे कि अगर यह आपका नहीं था, तो भारत के प्रतिष्ठित एआई समिट में चीन का कचरा प्रमोट करने की क्या ज़रूरत थी? क्या आप वहां चीन के सेल्स एजेंट बनकर गए थे?

जब दबाव और बढ़ा, तो उन्होंने अपने ‘अति-उत्साही’ प्रोफेसरों पर सारा ठीकरा फोड़कर माफी मांग ली। एक वरिष्ठ पत्रकार के नाते मेरा सवाल मैनेजमेंट से है—क्या आपके क्वालिफाइड प्रोफेसरों को इतना भी नहीं पता कि कौन सा प्रोजेक्ट उनके छात्रों ने बनाया है और कौन सा बाज़ार से खरीदा गया है? यह कोई मासूम गलती नहीं है। यह सीधे तौर पर सरकार से ‘AI Grants’ और फंड्स हथियाने की एक सोची-समझी साजिश लगती है। ऐसी यूनिवर्सिटीज़ रिसर्च के नाम पर फंड तो ले लेती हैं, पर काम के नाम पर ‘चीनी खिलौने’ दिखाती हैं।
जुगाड़ बनाम जालसाजी: असली इनोवेशन क्या है?
हमें समझना होगा कि ‘सकारात्मक जुगाड़’ और ‘धोखाधड़ी’ में फर्क होता है। भारत ने कम लागत में मंगल यान (ISRO’s Mars Mission) भेजा, वह असली इनोवेशन था। कोविड के समय हमारे युवाओं ने कम कीमत वाले वेंटिलेटर बनाए, वो असली एआई और इंजीनियरिंग थी। लेकिन एक चीनी कुत्ते पर अपना ठप्पा लगाना ‘जालसाजी’ है।

अगर हम ऐसी हरकतों को ‘जुगाड़’ कहकर माफ कर देंगे, तो उस असली स्टार्टअप और उस सच्चे छात्र का क्या होगा जो रात-भर जागकर असली एआई कोड लिख रहा है? इस एक कांड की वजह से अब विदेशी निवेशक हर भारतीय स्टार्टअप को शक की निगाह से देखेंगे। गलगोटियाज की इस हरकत ने उन हज़ारों ईमानदार छात्रों का रास्ता मुश्किल कर दिया है जो वाकई भारत का नाम रोशन करना चाहते हैं।
आगे का रास्ता: सख्त कार्रवाई और जवाबदेही
फिलहाल खबर यह है कि समिट में उस कियोस्क को ज़लील करके बंद कर दिया गया है और पूरी टीम को वापस नोएडा भेज दिया गया है। जांच की बातें हो रही हैं, लेकिन क्या इतना काफी है? टैक्सपेयर्स के करोड़ों रुपये इस इवेंट में लगे थे, और किसी की निजी महत्वाकांक्षा ने पूरे देश का नाम मिट्टी में मिला दिया।

मैं यह नहीं कहता कि यूनिवर्सिटी को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि वहां हज़ारों मासूम छात्रों का भविष्य जुड़ा है। लेकिन इसके ‘Top Management’ और उन प्रोफेसरों के खिलाफ ऐसी मिसाली कार्रवाई होनी चाहिए कि दोबारा कोई भी संस्थान भारत की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न करे। UGC और शिक्षा मंत्रालय को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या ये लोग ‘AI Grants’ के नाम पर सरकार को चूना तो नहीं लगा रहे थे?
निष्कर्ष: क्या हम ‘दिखावे’ के विश्व गुरु बनेंगे?
दोस्तों, ‘न्यू इंडिया’ का सपना केवल नारों और भव्य इमारतों से पूरा नहीं होगा। उसके लिए हमें ‘Asli Progress’ (असली प्रगति) और रिसर्च में ईमानदारी की ज़रूरत है। अगर हम चीन से रोबोट खरीदकर उसे अपना बताएंगे, तो हम कभी ‘विश्व गुरु’ नहीं बन पाएंगे, बल्कि केवल ‘विश्व जोकर’ बनकर रह जाएंगे।
हमें अपनी कमियों को स्वीकार करना होगा और जमीनी स्तर पर असली रिसर्च को बढ़ावा देना होगा। “शॉर्टकट” हमेशा गड्ढे में ही ले जाता है। क्या आपको लगता है कि केवल एक माफ़ीनामा इस राष्ट्रीय क्षति की भरपाई कर सकता है? क्या ऐसी यूनिवर्सिटीज़ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जो देश की साख को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नीलाम कर रही हैं?

(टेक्नोलॉजी और AI रिसर्च के लिए विश्वसनीय स्रोत)
अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर बताएं, क्योंकि यह सवाल सिर्फ एक रोबोट का नहीं, हमारे देश के सम्मान का है। जय हिंद!
FAQ
Q1. India AI Impact Summit 2026 क्या था?
यह भारत में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय एआई सम्मेलन था जिसमें विदेशी नेताओं, कंपनियों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।
Q2. विवाद किस बात पर हुआ?
एक विश्वविद्यालय द्वारा दिखाए गए रोबोटिक कुत्ते को स्वदेशी AI प्रोजेक्ट बताया गया, जबकि बाद में दावा हुआ कि वह खरीदा हुआ प्रोडक्ट था।
Q3. इससे भारत की छवि पर क्या असर पड़ा?
सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय चर्चा के कारण भारत की टेक विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
Q4. क्या जांच हुई?
रिपोर्ट्स के अनुसार जांच और जवाबदेही की मांग उठी तथा संबंधित स्टॉल हटाया गया।
Q5. इससे क्या सीख मिलती है?
टेक्नोलॉजी में असली रिसर्च, पारदर्शिता और सत्यापन बेहद जरूरी है — सिर्फ प्रदर्शन नहीं।

Yogesh banjara AI Hindi के Founder & CEO है | अगर आपको AI से अपनी life को EASY बनाना है तो आप हमारी site ai tool hindi पर आ सकते है|
