आजकल आप कहीं भी चले जाइए—चाहे वो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ग्रुप हों, मोहल्ले की नुक्कड़ वाली चाय की दुकान हो, या कॉर्पोरेट ऑफिस का ‘वॉटर कूलर’ गपशप ज़ोन—हर तरफ बस एक ही नाम गूँज रहा है: AI यानी Artificial Intelligence। कोई ChatGPT से अपनी प्रेमिका के लिए कविता लिखवा रहा है, तो कोई AI के फिल्टर लगाकर खुद को हॉलीवुड हीरो जैसा दिखा रहा है। भारत में तो ऐसा माहौल बना दिया गया है जैसे AI कोई ऐसी जादुई छड़ी है, जिसे घुमाते ही सबकी गरीबी मिट जाएगी और देश रातों-रात सिलिकॉन वैली बन जाएगा।
लेकिन भाई साहब, एक सीनियर टेक-फाइनेंशियल जर्नलिस्ट होने के नाते, मेरा काम आपको सिर्फ चमक-धमक दिखाना नहीं, बल्कि उस चमक के पीछे का ‘अंधेरा’ दिखाना भी है। आज जो हम देख रहे हैं, वो असल में एक ‘महारिस्क’ है। बड़ी-बड़ी टेक कंपनियाँ—OpenAI, Nvidia, और Oracle—हर दूसरे दिन अरबों डॉलर के ऐसे सौदों की घोषणा करती हैं जिन्हें सुनकर आम आदमी का सिर चकरा जाए। लेकिन अगर आप इन सौदों की बैलेंस शीट खोलकर देखेंगे, तो आपको समझ आएगा कि यह पूरा AI मार्केट एक ऐसे गुब्बारे (Bubble) की तरह है जिसमें ज़रूरत से ज्यादा हवा भरी जा रही है।
आज के इस डीप-डाइव ब्लॉग में, हम उस “कड़वे गणित” (Basic Mathematics) की बात करेंगे जिसे वॉल स्ट्रीट के बड़े खिलाड़ी आपसे छिपाना चाहते हैं। क्या वाकई AI के नाम पर हमें ‘टोपी’ पहनाई जा रही है? चलिए, इस हाई-स्टेक्स कॉर्पोरेट ड्रामा का ‘देसी’ विश्लेषण शुरू करते हैं।

1. OpenAI और Nvidia का ‘दिखावे का रिश्ता’: रिश्ता पक्का या सिर्फ दिखावा? (The Showy Relationship of OpenAI and Nvidia)
हाल ही में खबर आई कि OpenAI और Nvidia के बीच 100 अरब डॉलर (तकरीबन 8.4 लाख करोड़ रुपये) का एक मेगा-सौदा हुआ है। हेडलाइंस ऐसी थीं जैसे कल से ही दुनिया बदलने वाली है। लेकिन टेक जगत के दिग्गज एड ज़िट्रोन (Ed Zitron) ने जब Nvidia की फाइनेंशियल फाइलिंग (10-Q) की परतें खोलीं, तो सच कुछ और ही निकला।
‘रिश्ता पक्का’ बनाम ‘शादी’: इसे ऐसे समझिए—हमारे यहाँ जब रिश्ता तय होता है, तो उसे “शादी” नहीं कहते। Nvidia की फाइलिंग के मुताबिक, यह 100 अरब डॉलर का निवेश कोई पक्का वादा नहीं था, बल्कि सिर्फ एक “Letter of Intent” (LOI) था। सरल भाषा में कहें तो, यह सिर्फ एक ‘इच्छा पत्र’ है कि “शायद हम भविष्य में साथ काम करें।” न कोई चेक कटा, न कोई गारंटी दी गई। लेकिन मार्केट में ढिंढोरा ऐसे पीटा गया जैसे पैसा बैंक खाते में आ चुका हो।
सैम ऑल्टमैन (OpenAI के CEO) को ज़िट्रोन ने एक “चुलबुला गपशप करने वाला” (Gossip) करार दिया है। खबर तो यहाँ तक है कि OpenAI के अंदरखाने लोग Nvidia के चिप्स (GPUs) की स्पीड से तंग आ चुके हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, OpenAI को लगता है कि ‘इन्फरेंस’ (Inference – यानी AI के जवाब देने की गति) के मामले में Nvidia के चिप्स उम्मीद के मुताबिक नहीं हैं।
जब रॉयटर्स ने यह खबर छापी, तो सैम ऑल्टमैन ने इसे “इन्सैनिटी” (Insanity – यानी पागलपन) कहकर खारिज कर दिया। वहीं दूसरी ओर, Nvidia के CEO जेन्सेन हुआंग जब CNBC के ‘मैड मनी’ शो पर आए, तो वे जिम क्रेमर (Jim Cramer) के सामने ऐसे हड़बड़ा रहे थे जैसे कोई बच्चा चोरी करते पकड़ा गया हो। उन्होंने कहा, “हमें इस सौदे में आमंत्रित किया जाना सम्मान की बात थी।” भाई साहब, यह कोई मोहल्ले की शादी का कार्ड नहीं है, यह अरबों डॉलर का बिजनेस है! अगर बिजनेस में दम होता, तो जेन्सेन हुआंग सीधे आंकड़ों की बात करते, न कि ‘सम्मान’ और ‘प्यार’ की। असलियत तो यह है कि सैम ऑल्टमैन सिर्फ कहानियाँ सुना रहे हैं ताकि मार्केट में उनकी ‘हाइप’ बनी रहे और निवेश आता रहे।

अब बात करते हैं टेक जगत के ‘बुजुर्ग’ खिलाड़ी Oracle की। Oracle ने घोषणा की है कि वे OpenAI के साथ 5 साल के लिए 300 अरब डॉलर का सौदा कर रहे हैं। सुनने में तो ऐसा लगता है जैसे Oracle ने जैकपॉट जीत लिया हो, लेकिन ज़रा उनके बैंक बैलेंस पर नज़र डालिए।
क्रेडिट कार्ड पर ऐश (Mortgage on a Credit Card): Oracle की हालत आज उस इंसान जैसी है जो अपनी शान दिखाने के लिए क्रेडिट कार्ड से लोन लेकर दिवाली मना रहा है। उनके पास अपने डेटा सेंटर बनाने के लिए कैश नहीं है। इसलिए उन्होंने क्या किया? उन्होंने हाल ही में 25 अरब डॉलर के बॉन्ड बेचे हैं। यानी बाज़ार से भारी ब्याज पर उधार लिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने ‘At the Money’ (ATM) शेयर सेल शुरू की है।
शेयर डाइल्यूशन (Share Dilution) का पिज्जा मेटाफर: इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास एक पिज्जा है जिसके 4 बड़े टुकड़े हैं। अब कंपनी और अधिक शेयर छाप रही है, जिसका मतलब है कि उसी साइज़ के पिज्जा के अब 8 टुकड़े कर दिए जाएंगे। पिज्जा बड़ा नहीं हुआ, बस आपके हिस्से में आने वाला टुकड़ा छोटा हो गया। इसे ही ‘शेयर डाइल्यूट’ करना कहते हैं। Oracle अपने मौजूदा निवेशकों की जेब काट रहा है ताकि अपना कर्ज चुका सके। यह “DoorDash को Klarna (उधार) पर मँगवाने” जैसा है—यानी आज का खाना भी उधार के भरोसे है!
TikTok का डूबता जहाज: एक और बात जो कोई नहीं बता रहा—Oracle का एक और बड़ा ग्राहक है TikTok (ByteDance)। ज़िट्रोन के मुताबिक, TikTok एक “लॉसी” (Lossy) प्रोडक्ट है जो हर साल अरबों डॉलर जला रहा है। तो अब Oracle के दो सबसे बड़े ग्राहक कौन हैं? एक TikTok जो खुद घाटे में है, और दूसरा OpenAI जो हर महीने अरबों डॉलर का नुकसान कर रहा है। यह वैसा ही है जैसे एक डूबता हुआ आदमी दूसरे डूबते हुए आदमी का हाथ थाम ले।
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3. डेटा का खेल: दावों और हकीकत में अंतर (The Data Game: Claims vs. Reality Table)
नीचे दी गई टेबल से समझिए कि कॉर्पोरेट जगत के ये ‘जादूगर’ आपको क्या दिखा रहे हैं और परदे के पीछे का सच क्या है:
| कंपनी का नाम | बड़ा दावा (Flashy Claim) | कड़वा सच (The Hard Truth) | समय सीमा (Timeline) |
| OpenAI | $20 बिलियन का सालाना रेवेन्यू। | रेवेन्यू तो है, पर मुनाफा जीरो। कंपनी अरबों के घाटे में है और बिल चुकाने के लिए भी पैसे नहीं हैं। | वर्तमान (Current) |
| Nvidia | $100 बिलियन का OpenAI मेगा डील। | यह सिर्फ एक ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ (LOI) है। कोई कैश ट्रांसफर नहीं हुआ है। | अनिश्चित (Unknown) |
| Oracle | 300 अरब डॉलर की कैपेसिटी डील। | डेटा सेंटर बनाने का खर्च $189B है, जबकि जेब में उतने पैसे नहीं हैं। भारी कर्ज का बोझ। | 2029 तक |
| AMD/Broadcom | OpenAI के साथ बड़े चिप सौदे। | उनकी फाइनेंशियल ‘गाइडेंस’ में OpenAI से मिलने वाले किसी रेवेन्यू का जिक्र तक नहीं है। | 2026-27 |
| Microsoft | AI से रिकॉर्ड कमाई और $250B का RPO। | ‘Remaining Performance Obligations’ (RPO) असल में पिछले तिमाही के मुकाबले गिरी हैं। ग्रोथ स्थिर हो गई है। | वर्तमान (Current) |
4. पैसा कहाँ है? “सर्कुलर इकॉनमी” का खतरनाक चक्कर (Where’s the Money? The “Circular Economy” Trap)
क्या आपने कभी ऐसी दुकान देखी है जहाँ दुकानदार खुद ग्राहक को पैसे देता है ताकि ग्राहक उसकी दुकान से सामान खरीद सके? सुनने में यह पागलपन लगता है, लेकिन AI की दुनिया में इसी को “वेंडर फाइनेंसिंग” (Vendor Financing) कहते हैं।
दुकानदार और ग्राहक का खेल: मान लीजिए रामू की दुकान है। श्यामू के पास पैसे नहीं हैं। रामू अपनी जेब से श्यामू को 100 रुपये देता है और कहता है, “जाओ, मेरी ही दुकान से आटा खरीद लो।” अब रामू अपने बही-खाते में लिखता है कि “मेरी 100 रुपये की कमाई हुई!” लेकिन असल में तो पैसा रामू की ही जेब से घूमकर वापस आया है।
Nvidia यही खेल खेल रही है। उन्होंने Coreweave जैसी ‘नियोक्लाउड’ कंपनियों में अरबों डॉलर का ‘लाइफलाइन’ निवेश किया है। क्यों? ताकि Coreweave उन पैसों से Nvidia से चिप्स खरीद सके। फिर Coreweave वही चिप्स OpenAI को किराए पर देता है। एड ज़िट्रोन का कहना है कि Coreweave इस पूरे खेल का “पहला डोमिनो” (First Domino) हो सकता है जो गिरेगा। Coreweave कोई मुनाफा नहीं कमा रही है, वो सिर्फ Nvidia के दिए हुए ऑक्सीजन पर ज़िंदा है।
जेन्सेन हुआंग एक ऐसी स्थिति (Kobayashi Maru) में फंस गए हैं जहाँ जीतना नामुमकिन लग रहा है। वे बस हर उस छेद को अपनी उंगलियों से बंद करने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ से पानी रिस रहा है, ताकि यह ‘AI का बांध’ न टूटे। ज़िट्रोन इसे “खुद को कार्डबोर्ड खिलाना” (Feeding yourself cardboard) कहते हैं—यानी आप पेट भरने का नाटक तो कर रहे हैं, पर पोषण (असली पैसा) कहीं नहीं है।

5. क्या मार्केट ‘बच्चों’ के भरोसे चल रहा है? (Is the Market Run by Toddlers?)
जब कोई बैंक अचानक जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि “हमारे पास बहुत पैसा है, आप चिंता मत करो,” तो समझ लीजिए कि बैंक डूबने वाला है। इसे एड ज़िट्रोन “बैंक रन लैंग्वेज” (Bank Run Language) कहते हैं।
हाल ही में जब Oracle के शेयरों में गिरावट आई, तो उन्होंने एक अजीबोगरीब ट्वीट किया: “हमें OpenAI की फंडिंग जुटाने की क्षमता पर पूरा भरोसा है।” भाई साहब, अगर सब ठीक है तो सफाई देने की क्या ज़रूरत है? ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई कमरे में घुसते ही चिल्लाए, “मैंने किसी का खून नहीं किया!” ज़ाहिर है, अब सब आप पर ही शक करेंगे।
गणित का मजाक: एनालिस्ट्स का कहना है कि एक डेटा सेंटर बनाने की लागत 42 मिलियन प्रति मेगावाट** है। Oracle जिस 4.5 गीगावॉट (GW) की बात कर रहा है, उसका कुल खर्च **189 अरब डॉलर (189 Billion) बैठता है। Oracle ने अभी तक सिर्फ 50-60 अरब डॉलर जुटाए हैं। बाकी का पैसा कहाँ से आएगा?
हैरानी की बात यह है कि मार्केट के एनालिस्ट्स सिर्फ अगले 3 से 6 महीनों का मुनाफा देख रहे हैं। वे यह नहीं देख रहे कि 2029 तक ये कंपनियाँ अपना पहाड़ जैसा कर्ज कैसे चुकाएंगी।
- Credit Default Swaps (CDS): यह एक तरह का बीमा होता है जो तब काम आता है जब कंपनी डूब जाए। ताज्जुब की बात है कि Oracle पर कर्ज बढ़ रहा है, लेकिन उसके CDS की कीमतें गिर रही हैं। इसका मतलब है कि मार्केट या तो अंधा है या फिर “छोटे बच्चों” (Toddlers) द्वारा चलाया जा रहा है जो बेसिक प्लस-माइनस भी नहीं जानते।

6. ‘स्टारगेट’ और हकीकत का अंतर (Stargate vs. Reality)
Microsoft और OpenAI मिलकर ‘Stargate’ नाम का एक सुपरकंप्यूटर बनाने की बात कर रहे हैं। इसकी लागत 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा बताई जा रही है। लेकिन एड ज़िट्रोन ने एक नायाब पॉइंट पकड़ा है—Microsoft के ‘Remaining Performance Obligations’ (RPO) असल में कम हुए हैं। पिछले क्वार्टर में ये 40% थे, जो अब गिरकर 25% पर आ गए हैं। इसका मतलब है कि नई डिमांड नहीं आ रही है, बस पुरानी बातों को घुमा-फिराकर पेश किया जा रहा है।
अमेज़न (Amazon) के पास 80 अरब डॉलर का कैश है, लेकिन वे भी $50 बिलियन के निवेश की बात सुनकर हिचकिचा रहे हैं। अगर वे भी ‘AWS क्रेडिट्स’ में पेमेंट करते हैं, तो वो भी “कार्डबोर्ड खाने” जैसा ही होगा—यानी कागजी मुनाफा, असली कैश गायब।

7. भारतीय निवेशकों और टेक प्रेमियों के लिए 4 बड़े सबक (Lessons for Indian Investors)
अगर आप भी AI के नाम पर अपना पैसा या समय लगा रहे हैं, तो इन 4 बातों को गाँठ बाँध लीजिए:
- प्रेस रिलीज को सच न मानें: कॉर्पोरेट घोषणाएँ अक्सर ‘हवा-बाजी’ होती हैं। जब तक कंपनी की आधिकारिक फाइलिंग (10-Q या SEBI रिपोर्ट) में पैसा न दिखे, उसे ‘डील’ न मानें।
- कर्ज की गहराई नापें: अगर कोई कंपनी AI के नाम पर ‘बॉन्ड’ बेच रही है या शेयर डाइल्यूट कर रही है, तो समझ लीजिए कि उसके पास अपना पैसा खत्म हो चुका है। उधार की घी से सेहत नहीं बनती।
- असली डिमांड की तलाश करें: क्या AI का इस्तेमाल आम कंपनियाँ कर रही हैं या सिर्फ OpenAI ही इकलौता ग्राहक है? अगर पूरी इंडस्ट्री सिर्फ एक ग्राहक (OpenAI) के भरोसे टिकी है, तो यह ताश के पत्तों का महल है।
- मुनाफा (Profit) ही असली राजा है: रेवेन्यू बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन अगर $1 कमाने के लिए $2 खर्च करने पड़ रहे हैं, तो वो बिजनेस मॉडल नहीं, बल्कि ‘टोपी पहनाने’ का धंधा है।
8. निष्कर्ष: क्या यह 2000 के ‘डॉट-कॉम’ जैसा है? (Conclusion: Is this like the Dot-Com Bubble?)
साल 2000 में जब ‘डॉट-कॉम’ का बुलबुला फटा था, तब भी यही हुआ था—हर कंपनी के नाम के आगे ‘.com’ लगा था और निवेशक बिना सोचे-समझे पैसा लुटा रहे थे। आज वही कहानी ‘AI’ के साथ दोहराई जा रही है। इनोवेशन (नवाचार) बुरा नहीं है, AI भविष्य में काम भी आएगा, लेकिन “हवा-बाजी” (Hot Air) से न तो बिल भरे जाते हैं और न ही इकोनॉमी चलती है।

गणित कभी झूठ नहीं बोलता। अगर OpenAI के पास पैसे नहीं हैं, Oracle कर्ज में डूबा है, और Nvidia अपने ही ग्राहकों को पैसे बाँट रहा है, तो समझ लीजिए कि हम एक बड़े आर्थिक धमाके के मुहाने पर खड़े हैं। 2029 दूर नहीं है, और तब तक ये कंपनियाँ शायद अपनी ही बनाई ‘भविष्य की कहानियों’ के बोझ तले दब चुकी होंगी।
🔗 Investopedia – AI Bubble Explained
https://www.investopedia.com/tech-bubble-definition-5219889
(यह लिंक AI और टेक बबल को सामान्य निवेशकों की भाषा में समझाता है और SEO के लिए भी सुरक्षित है।)
तो दोस्तों, अगली बार जब आप AI की किसी ‘ऐतिहासिक’ डील के बारे में सुनें, तो अपनी आँखों पर चढ़ा ‘हाइप’ का चश्मा उतारकर ज़रा ‘हिसाब-किताब’ लगाइएगा। सावधान रहें और समझदार बनें!
मिलते हैं अगले ब्लॉग में, तब तक के लिए—राम-राम!
❓ FAQ – AI Bubble से जुड़े सवाल
प्रश्न 1: AI Bubble से क्या मतलब है?
उत्तर: जब किसी तकनीक के नाम पर उम्मीदें और निवेश हकीकत से बहुत ज़्यादा बढ़ जाएँ और मुनाफा न दिखे, तो उसे “बुलबुला” कहा जाता है।
प्रश्न 2: क्या OpenAI और Nvidia की डील सच में फाइनल है?
उत्तर: नहीं, कई रिपोर्ट्स के अनुसार यह केवल Letter of Intent (LOI) है, न कि पक्का कैश ट्रांजैक्शन।
प्रश्न 3: क्या AI भविष्य में बेकार साबित होगा?
उत्तर: नहीं, AI उपयोगी तकनीक है, लेकिन मौजूदा निवेश और वैल्यूएशन जरूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है।
प्रश्न 4: भारतीय निवेशकों को AI से डरना चाहिए?
उत्तर: डरना नहीं, लेकिन बिना बैलेंस शीट और कर्ज समझे निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है।

Yogesh banjara India के सबसे BEST AI साइट AI Hindi के Founder & CEO है । वे Ai Tools और AI Technology में Expert है | अगर आपको AI से अपनी life को EASY बनाना है तो आप हमारी site ai tool hindi पर आ सकते है|
