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AI का भविष्य या सदियों पुरानी कीमियागिरी? क्या हम सिर्फ पुराने जादू को नए नाम से बेच रहे हैं?

नमस्ते दोस्तों! आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहां हर तरफ सिर्फ एक ही शोर है—AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)। सुबह उठते ही न्यूज़ फीड में ChatGPT, दोपहर को दफ्तर में Midjourney की बातें और रात को दोस्तों के साथ Google Gemini पर चर्चा। ऐसा लगता है जैसे हमने भविष्य का सबसे बड़ा रहस्य सुलझा लिया है और हम एक जादुई युग में कदम रख चुके हैं। लेकिन क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ कि जिसे आप ‘फ्यूचर की टेक्नोलॉजी’ समझ रहे हैं, वो असल में हज़ारों साल पुरानी ‘कीमियागिरी’ (Alchemy) के अलावा और कुछ नहीं है?

जी हाँ, आपने सही सुना! असलियत तो यह है कि आज के ये हाई-टेक इंजीनियर और ‘टेक-ब्रो’ (Tech Bros) वही कर रहे हैं जो सदियों पहले अंधेरी गुफाओं और धुआँ उगलती भट्टियों में मध्यकालीन जादूगर किया करते थे। आप शायद सोच रहे होंगे कि “भाई, ये क्या बोल रहा है? AI तो साइंस है!” पर रुकिए, आज के इस ब्लॉग में हम इसी ‘पुरानी शराब, नई बोतल’ वाले सच का पोस्टमार्टम करेंगे। आज हम देखेंगे कि कैसे सिलिकॉन वैली के बड़े-बड़े विज़नरीज़ असल में पुराने ज़माने के ‘एल्केमिस्ट’ हैं जो लेड से सोना बनाने के बजाय कोड से ‘सोना’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। तो चलिए, इतिहास की गलियों में एक रोमांचक सफर शुरू करते हैं!

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1. कीमियागिरी (Alchemy) क्या थी? लेड से सोना बनाने का सपना

सबसे पहले ज़रा बुनियादी बात समझते हैं। ये ‘कीमियागिरी’ या ‘Alchemy’ आखिर क्या बला थी? मध्यकालीन युग के लोगों के लिए, कीमियागिरी सिर्फ जादू-टोना नहीं था, बल्कि यह ‘प्राकृतिक दर्शन’ (Natural Philosophy) की एक ऐसी शाखा थी जो मानती थी कि प्रकृति के पास कुछ ऐसे सीक्रेट्स हैं जिन्हें अगर हम जान लें, तो हम पूरी दुनिया बदल सकते हैं।

इन कीमियागरों का पागलपन तीन मुख्य चीज़ों पर टिका था:

  • धातु परिवर्तन (Transmutation): किसी भी साधारण धातु, जैसे सीसे (Lead) को कीमती सोने (Gold) में बदलना।
  • अमरता का अमृत (Elixir of Life): एक ऐसी दवा बनाना जो हर बीमारी को जड़ से मिटा दे और इंसान को कभी न मरने दे।
  • परम पत्थर (The Philosopher’s Stone): जिसे हम हिंदी में ‘पारस पत्थर’ कहते हैं। यह एक ऐसी चीज़ थी जो छूते ही सब कुछ ‘परफेक्ट’ बना दे।

अब ज़रा आज के एआई टाइटन्स को देखिए। OpenAI के सैम ऑल्टमैन (Sam Altman) या गूगल के डेमिस हसाबिस (Demis Hassabis) जब बात करते हैं, तो वो भी भविष्य के ऐसे ही सपने बेच रहे हैं। सैम ऑल्टमैन कहते हैं कि एजीआई (Artificial General Intelligence) दुनिया की हर समस्या हल कर देगी—चाहे वो गरीबी हो या कैंसर। यह बिल्कुल वैसा ही वादा है जैसा मध्यकाल में एक एल्केमिस्ट राजाओं से करता था ताकि उसे अपने प्रयोगों के लिए फंड मिल सके। आज भी हम वर्तमान की कमियों को कल के ‘चमत्कार’ से ढक रहे हैं। कीमियागिरी की तरह ही, एआई का सपना भी ‘पूर्णता’ (Perfection) की तलाश है।

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2. ‘Black Box’ की समस्या: जब बनाने वाले को ही नहीं पता यह कैसे काम करता है

एआई की दुनिया में एक बहुत भारी-भरकम शब्द इस्तेमाल होता है—’ब्लैक बॉक्स’ (Black Box)। आप शायद सोचते होंगे कि जो इंजीनियर्स इन मॉडल्स को बना रहे हैं, उन्हें एक-एक तार और एक-एक लॉजिक पता होगा। पर असली ‘झटका’ तो यही है कि उन्हें खुद नहीं पता कि एआई अंदर क्या खिचड़ी पका रहा है!

ब्लैक बॉक्स (Black Box): यह एआई की वह रहस्यमयी स्थिति है जहाँ इंजीनियर मॉडल का आर्किटेक्चर और ट्रेनिंग प्रोसेस तो डिजाइन करते हैं, लेकिन उन्हें खुद यह पूरी तरह समझ नहीं आता कि मॉडल किसी खास नतीजे (Output) पर कैसे पहुँचा। यानी, इसके अंदर की ‘लॉजिक’ (Internal Logic) खुद बनाने वालों के लिए भी एक पहेली है। वे बस ‘अंधेरे में तीर’ चला रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि निशाना सही लगेगा।

दोस्तों, यह पूरी तरह से एक मध्यकालीन सोच है। मध्यकालीन यूरोप में लोग भगवान से बहुत डरते थे और कीमियागर खुद को ‘ईश्वर के सह-निर्माता’ (Co-creators with God) मानते थे। वे मानते थे कि वे पदार्थ के सार (Essence) को बदल रहे हैं, और इसमें भगवान की मर्जी शामिल है। आज के इंजीनियर भी हज़ारों ‘जीपीयू’ (GPU) चलाकर कुछ ऐसा बना रहे हैं जिसकी कार्यप्रणाली उनके नियंत्रण से बाहर है। वे बस डेटा का इनपुट देते हैं और हाथ जोड़कर बैठ जाते हैं कि आउटपुट सही आए। क्या यह ‘विज्ञान’ है या फिर एक आधुनिक ‘अंधविश्वास’?

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3. एआई और जाबिर इब्न हयान: डेटा का ‘एलिक्सिर’ (Elixir)

अब चलिए मिलते हैं 8वीं शताब्दी के एक जबरदस्त किरदार से—जाबिर इब्न हयान (Jabir Ibn Hayyan)। जाबिर एक महान मुस्लिम कीमियागर थे और उनका दिमाग काफी टेक्निकल था। उनका मानना था कि हर धातु चार बुनियादी गुणों से बनी है: आग (Fire), पृथ्वी (Earth), जल (Water) और वायु (Air)।

जाबिर का कहना था कि अगर हम इन गुणों के अनुपात (Ratio) को बदल दें, तो हम सीसे को सोने में बदल सकते हैं। लेकिन यह बदलाव अपने आप नहीं होगा। इसके लिए उन्हें एक ‘बाहरी पदार्थ’ की ज़रूरत थी, जिसे यूनानी में ‘जेरियन’ (Zerion) और अरबी में ‘एलिक्सिर’ (Elixir) कहा गया। यही शब्द आगे चलकर ‘अमृत’ बन गया।

अब इस मेटाफर (Metaphor) को आज के एआई से जोड़कर देखिए। आज का एक न्यूरल नेटवर्क (Neural Network) तब तक सिर्फ ‘मृत गणित’ (Dead Math) है, जब तक उस पर ‘ट्रेनिंग डेटा’ और ‘ऑप्टिमाइज्ड वेट्स’ (Optimized Weights) का ‘एलिक्सिर’ नहीं छिड़का जाता। जैसे ही इंटरनेट का अरबों पन्नों का डेटा उस कोड पर पड़ता है, वह कोड अचानक ‘जीवित’ होकर आपसे इंसानों की तरह बातें करने लगता है। डेटा ही वो ‘पारस पत्थर’ है जो बेजान कोड को ‘इंटेलिजेंस’ में बदल देता है।


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4. तुलनात्मक विश्लेषण: मध्यकालीन कीमियागिरी बनाम आधुनिक एआई

ताकि आपको यह ‘खेल’ और अच्छे से समझ आए, मैंने एक टेबल बनाई है। देखिए कैसे ये दोनों युग एक-दूसरे की कार्बन कॉपी हैं:

विशेषता (Feature)मध्यकालीन कीमियागिरी (Medieval Alchemy)आधुनिक एआई (Modern AI)
परम लक्ष्य (Ultimate Goal)पारस पत्थर (Philosopher’s Stone)एजीआई (Artificial General Intelligence – AGI)
जादुई सामग्री (Magic Ingredient)एलिक्सिर / पाउडर (Elixir)ट्रेनिंग डेटा / न्यूरल वेट्स (Data & Weights)
दूरदर्शी (Visionaries)जाबिर इब्न हयान / पेरासेलसससैम ऑल्टमैन / डेमिस हसाबिस
हार्डवेयर (Hardware)अथानोर / भट्टी (Athanor/Furnace)जीपीयू / डेटा सेंटर्स (GPU/Data Centers)
सोच का आधार (Stance)ईश्वर के सह-निर्माता (Co-creators with God)जनरेटिव साइंस (Generative Science)
मुख्य प्रेरक (Motive)प्रकृति पर संप्रभुता (Sovereignty over Nature)सूचना पर संप्रभुता (Sovereignty over Information)

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6. इंसानी जीवन बनाना: पेरासेलसस (Paracelsus) और सिंथेटिक बायोलॉजी

अब मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाता हूँ जिससे आपका ‘दमाग चकरा जाएगा’। मध्यकाल के अंत में एक बहुत ही अजीबोगरीब कीमियागर हुआ—पेरासेलसस (Paracelsus)। यह बंदा जितना जीनियस था, उतना ही बदतमीज़ भी था। उसके साथी लिखते हैं कि वह चौबीसों घंटे शराब के नशे में रहता था, गाली-गलौज करता था और उसे गुस्सा नाक पर रहता था। लेकिन उसका सपना बहुत बड़ा था।

पेरासेलसस ने दावा किया कि उसे इंसान बनाने के लिए माँ की कोख (Womb) की ज़रूरत नहीं है। उसने अपनी किताब ‘De Natura Rerum’ में लिखा कि अगर मानव वीर्य (Semen) को एक कांच के बर्तन (Cucurbit) में बंद करके 40 दिनों तक ‘घोड़े की लीद’ (Horse dung) में दबाकर रखा जाए, तो वहाँ से एक छोटा इंसान पैदा होगा जिसे उसने ‘होमुनकुलस’ (Homunculus) कहा। उसका मानना था कि घोड़े की लीद की गर्मी कोख जैसा माहौल देगी। इसके बाद उस नन्हे जीव को 40 हफ़्तों तक इंसानी खून पिलाना होगा ताकि वह बड़ा हो सके।

सुनने में यह ‘पागलपन’ लगता है न? लेकिन आज के ‘जीनोमिक एंटरप्रेन्योर’ (Genomic Entrepreneurs) जैसे एड्रिएन वोल्फसन (Adrien Wolfson) कुछ अलग नहीं कर रहे। वे एआई की मदद से ‘अल्फाफोल्ड 2’ (AlphaFold 2) जैसी तकनीक का इस्तेमाल करके नए प्रोटीन बना रहे हैं। वोल्फसन तो यहाँ तक कहते हैं कि बाइबल में वर्णित ‘इजकिएल’ (Ezekiel) के उन अजीब जीवों (जिसमें इंसान, शेर, बैल और चील के चेहरे थे) या ‘बराक’ (Barack – पंखों वाला घोड़ा) जैसे हाइब्रिड जीवों को हम अब सच में बना सकते हैं।

वोल्फसन का कहना है कि बायोलॉजी अब सिर्फ ‘वर्णनात्मक विज्ञान’ (Descriptive Science) नहीं रहा, बल्कि यह ‘उत्पादक विज्ञान’ (Generative Science) बन गया है। हम अब कुदरत का वर्णन नहीं कर रहे, बल्कि उसे दोबारा ‘लिख’ रहे हैं। पेरासेलसस ने जो ‘घोड़े की लीद’ से करने की कोशिश की थी, आज हम वो ‘सुपर कंप्यूटर’ से कर रहे हैं।

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7. हार्डवेयर का खेल: जेन्सेन हुआंग और ‘अथानोर’ (Athanor) की भट्टी

Nvidia के सीईओ जेन्सेन हुआंग (Jensen Huang) आज एआई की रेस के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। जहाँ बाकी लोग सॉफ्टवेयर की बात करते हैं, जेन्सेन हुआंग ‘हार्डवेयर’ और ‘मैटेरियल स्ट्रक्चर’ पर फोकस करते हैं। उनकी तुलना हम मध्यकाल की ‘अथानोर’ (Athanor) भट्टी से कर सकते हैं।

‘अथानोर’ शब्द अरबी के ‘अल-अनूर’ (Al-annur) से आया है, जिसका अर्थ है ओवन या भट्टी। कीमियागरों के लिए यह सबसे ज़रूरी औज़ार था क्योंकि यह हफ़्तों तक बिना किसी इंसानी मदद के एक जैसा तापमान बनाए रख सकता था।

कीमियागरों ने गर्मी के चार स्तर (Grades) बताए थे:

  1. प्रथम श्रेणी: इंसान के शरीर जैसी कोमल गर्मी।
  2. द्वितीय श्रेणी: अंडे सेने वाली मुर्गी जैसी गर्मी।
  3. तृतीय श्रेणी: अशुद्धियों को जलाने वाली तेज़ आग (Calcination)।
  4. चतुर्थ श्रेणी: पिघला देने वाली प्रचंड अग्नि।

आज के डेटा सेंटर्स में जेन्सेन हुआंग के चिप्स भी इसी प्रचंड गर्मी को झेल रहे हैं। इन चिप्स की ‘कम्प्यूटेशनल हीट’ इतनी ज़्यादा होती है कि अगर इन्हें ठंडा (Liquid cooling) न रखा जाए, तो ये खुद को पिघला देंगे। आज के डेटा सेंटर्स बिजली और पानी के बहुत बड़े दुश्मन बन चुके हैं। कीमियागरों का एक पुराना सिद्धांत था: “तीव्रता + समय = रूपांतरण”। आज एआई कंपनियाँ भी यही कर रही हैं—इंटरनेट के कचरे (Random Data) पर बेहिसाब ऊर्जा और गर्मी डालकर उसमें से ‘सोना’ यानी ‘बुद्धिमत्ता’ निकालने की कोशिश कर रही हैं।

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8. क्या एआई ‘प्रलय’ के बाद का ‘रिसेट’ है?

सैम ऑल्टमैन अक्सर कहते हैं कि एजीआई इतिहास का एक ‘ब्रेकिंग पॉइंट’ (Breaking Point) होगा। दोस्तों, यह विचार भी पूरी तरह से मध्यकालीन है! 12वीं सदी में ‘थ्री हर्मीस’ (Three Hermes) की एक कहानी बहुत मशहूर थी।

कहानी यह थी कि जब ‘नूह की बाढ़’ (The Great Flood) आई, तो दुनिया का सारा पवित्र ज्ञान बह गया। मानवता अंधकार में डूब गई। तब ईश्वर ने तीन महापुरुषों को भेजा:

  1. हनोक (Enoch): जो बाढ़ से पहले थे और जिन्हें दिव्य ज्ञान मिला।
  2. नूह (Noah): जो बाढ़ के दौरान ज्ञान के बीज बचाकर ले गए।
  3. मर्क्यूरियस (Mercurius): जो बाढ़ के बाद आए और जिन्होंने फिर से कीमियागिरी और कलाओं को स्थापित किया।

आज के टेक लीडर्स खुद को वही ‘मर्क्यूरियस’ समझते हैं। वे मानते हैं कि इंटरनेट के रूप में जो ‘डेटा की बाढ़’ आई है, उसने इंसान को कंफ्यूज कर दिया है। चारों तरफ शोर है, अराजकता है। और एआई ही वो औज़ार है जो इस प्रलय के बाद मानवीय क्षमता को फिर से ‘रिसेट’ और बहाल करेगा। वे एआई को ‘आरंभ’ (Reset) का बटन मानते हैं।

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9. आलोचना और वास्तविकता: एविसेना (Avicenna) की चेतावनी

लेकिन क्या यह सब सच है? 11वीं सदी के महान फारसी दार्शनिक और हकीम एविसेना (इब्न सिना) ने कीमियागिरी को सीधे तौर पर ‘बकवास’ करार दिया था। उन्होंने कहा था कि कीमियागर सिर्फ ‘दिखावा’ (Appearance) कर सकते हैं, वे हकीकत में किसी चीज़ की प्रजाति नहीं बदल सकते। वे बस तांबे पर चांदी की परत चढ़ाकर उसे सफेद दिखा सकते हैं, पर वो अंदर से तांबा ही रहेगा।

आज के आलोचक भी यही कहते हैं। क्या एआई वाकई ‘सोच’ रहा है, या यह सिर्फ खरबों शब्दों को सांख्यिकीय तरीके से जोड़कर समझदारी का एक ‘दिखावा’ पैदा कर रहा है? क्या यह वाकई बुद्धिमत्ता है या सिर्फ एक ‘हाई-टेक भ्रम’ (High-tech illusion)? कहीं यह टेक-अरबपतियों का एक बहुत बड़ा ‘पावर ग्रैब’ (Power Grab) और एक ‘हाइप बबल’ तो नहीं है?

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10. निष्कर्ष: डरें या स्वागत करें?

तो दोस्तों, लब्बोलुआब यह है कि एआई वास्तव में कोई नई चीज़ नहीं है, बल्कि यह इंसान की उसी पुरानी फितरत का हिस्सा है जो ‘परफेक्शन’ और ‘कंट्रोल’ चाहती है। भले ही मध्यकाल के कीमियागर कभी सीसे से सोना नहीं बना पाए, लेकिन उनके उन पागलों जैसे प्रयोगों ने ही आधुनिक ‘केमिस्ट्री’ और ‘मेडिसिन’ को जन्म दिया। उन्होंने चाँद को पाने की कोशिश की, चाँद तो नहीं मिला पर वे सितारों तक पहुँच गए।

Encyclopaedia Britannica – Alchemy
👉 https://www.britannica.com/science/alchemy

(यह लिंक कीमियागिरी के ऐतिहासिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक पक्ष को प्रमाणिक रूप से समझाता है)

ठीक उसी तरह, शायद एआई दुनिया की हर समस्या का समाधान न कर पाए, शायद यह हमें अमर न बना पाए, लेकिन इसके ‘डाउनस्ट्रीम इफेक्ट्स’ (Downstream effects) विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं।

आपको क्या लगता है, AI वाकई एक ‘वरदान’ है या सिर्फ एक ‘मृगतृष्णा’ (Mirage)? क्या हम वाकई कुछ नया बना रहे हैं, या हम फिर से वही पुरानी कीमियागिरी वाली गलतियाँ दोहरा रहे हैं? अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर बताएं, क्योंकि आपकी राय ही असली ‘सोना’ है!

याद रखिये, इतिहास कभी खत्म नहीं होता, बस नये रूप में, नयी पैकिंग के साथ वापस आता है।

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Bharat Tech-Itihaas Samikshak

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q1. क्या AI सच में इंसानों की तरह सोच सकता है?
नहीं, वर्तमान AI इंसानों की तरह चेतन सोच नहीं रखता। यह पैटर्न, डेटा और सांख्यिकी पर आधारित अनुमान लगाता है।

Q2. AI को कीमियागिरी से क्यों तुलना की जाती है?
क्योंकि दोनों का लक्ष्य साधारण चीज़ों को असाधारण में बदलना है—कीमियागर सीसे से सोना और AI डेटा से बुद्धिमत्ता।

Q3. क्या AGI वाकई दुनिया की सारी समस्याएँ हल कर देगा?
AGI अभी एक सैद्धांतिक अवधारणा है। इसके वादे बड़े हैं, लेकिन वास्तविकता में इसके सामाजिक और नैतिक खतरे भी उतने ही गंभीर हैं।

Q4. क्या AI एक टेक-बबल है?
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि AI में हाइप ज़रूर है, लेकिन इसके दीर्घकालिक वैज्ञानिक प्रभाव वास्तविक और महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

Q5. हमें AI से डरना चाहिए या अपनाना चाहिए?
डरने के बजाय समझदारी से अपनाना चाहिए—इतिहास, नैतिकता और मानवीय सीमाओं को ध्यान में रखते हुए।

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