क्या सच में रोबोट हमारी जगह ले लेंगे?
आजकल आप किसी भी शहर की ‘चाय की टपरी’ पर चले जाइए या मुखर्जी नगर और प्रयागराज की लाइब्रेरी के बाहर सुस्ताते छात्रों की बातें सुनिए, एक ही चर्चा गरम है— “भाई, ये AI (Artificial Intelligence) तो सबकी लंका लगा देगा!” युवाओं के मन में एक गहरा डर, एक अजीब सी बेचैनी बैठ गई है। हर कोई यही पूछ रहा है कि जिस सरकारी या प्राइवेट नौकरी के लिए हम अपनी जवानी खपा रहे हैं, क्या 10 साल बाद वह नौकरी बचेगी भी? क्या रोबोट आकर हमारी कुर्सी छीन लेंगे?
मशहूर मेंटर डॉ. विकास दिव्यकीर्ती, जो अपनी तार्किक समझ और सरल अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं, उनका कहना है कि आने वाला भविष्य बहुत ही “अजीब” (Strange) होने वाला है। ऐसा कुछ होने वाला है जो पिछले 3 लाख सालों के मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ। आजकल बच्चों के पसीने यह सोचकर छूट रहे हैं कि हमने तो तैयारी की थी इंसानों से लड़ने की, लेकिन सामने तो ‘सिलिकॉन चिप’ खड़ी है। यह डर जायज भी है क्योंकि तकनीक जिस रफ्तार से बढ़ रही है, वह हमारी कल्पना से परे है। तो चलिए, आज एक बड़े भाई और मार्गदर्शक के नाते मैं आपको डॉ. साहब के उन इनसाइट्स के जरिए समझाता हूँ कि असल में माजरा क्या है और आपको डरना चाहिए या संभलना चाहिए।

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एआई (AI) और नौकरियों का बदलता स्वरूप: आखिर हड़कंप क्यों है?
भारत जैसे देश में जहाँ जनसंख्या पहाड़ जैसी है और अवसर मुट्ठी भर, वहां कंपटीशन का मतलब ही ‘ गलाकाट प्रतियोगिता’ होता है। डॉ. दिव्यकीर्ती के अनुसार, AI का आना सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत मोड़ (Civilizational Shift) है। प्राइवेट सेक्टर में तो अभी से गाज गिरनी शुरू हो गई है। कंपनियाँ अब ऐसे ‘वर्कर्स’ चाहती हैं जो न बीमार पड़ें, न छुट्टी मांगें और न ही सैलरी बढ़ाने के लिए यूनियन बनाएं।
डॉ. साहब क्यों मानते हैं कि भविष्य अनिश्चित है? इसके कुछ ठोस कारण समझिए:

- इंसान बनाम मशीन की पहली जंग: पिछले 3 लाख सालों से इंसान सिर्फ दूसरे इंसान से कंपटीशन कर रहा था—एक हरियाणवी होमो-सेपियंस का मुकाबला बिहारी होमो-सेपियंस से था। लेकिन अब पहली बार हमारा मुकाबला ऐसी मशीन से है जो हमसे लाखों गुना तेज सोच सकती है।
- निजी क्षेत्र में छंटनी का डर: प्राइवेट सेक्टर में मुनाफा सर्वोपरि है। अगर एक AI टूल 100 लोगों का काम अकेले कर सकता है, तो कंपनी 100 लोगों को क्यों रखेगी? यह कड़वा सच है।
- हुनर की एक्सपायरी डेट: आज आप जो कोडिंग या स्किल सीख रहे हैं, हो सकता है 5 साल बाद AI उसे खुद ही कर ले। यानी आपको अपनी ‘स्किल’ को हर दूसरे साल अपडेट करना होगा।
- अजीब भविष्य: तकनीक इतनी “विचित्र” होगी कि शायद हम यह पहचान ही न पाएं कि हमारे सामने बात करने वाला इंसान है या कोई रोबोट।
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अग्निपथ योजना और ड्रोन टेक्नोलॉजी: सरकार की दूरगामी सोच
जब सरकार ने ‘अग्निवीर’ या ‘अग्निपथ’ योजना शुरू की, तो पूरे देश में बवाल मच गया। युवाओं ने गुस्से में ट्रेनें जला दीं, क्योंकि उन्हें लगा कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। लेकिन डॉ. दिव्यकीर्ती यहाँ एक अलग नजरिया पेश करते हैं। वे कहते हैं कि सरकारें बहुत आगे की सोचकर फैसले लेती हैं। उन्हें दिख रहा है कि भविष्य के युद्ध अब ‘लाठी-गोली’ से कम और ‘बटन-सॉफ्टवेयर’ से ज्यादा लड़े जाएंगे।
डॉ. साहब “ऑपरेशन सिंदूर” (जो उन्होंने बालाकोट और सटीक हमलों के संदर्भ में इस्तेमाल किया) का उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि आज के दौर में युद्ध का चेहरा बदल गया है। इस पूरे ऑपरेशन में हमारी जल सेना को उतरना ही नहीं पड़ा। थल सेना को टैंक लेकर बॉर्डर पार करने की जरूरत नहीं पड़ी। पूरा मामला एयरफोर्स और टेक्नोलॉजी पर सिमट गया। हमने 100-150 किलोमीटर दूर बैठकर ‘प्रिसिजन वेपन्स’ (सटीक हथियारों) से दुश्मन के ठिकानों को धुआं-धुआं कर दिया।

आज तुर्की जैसा छोटा देश ‘ड्रोन टेक्नोलॉजी’ में दुनिया को नचा रहा है। चीन और अमेरिका अपनी सेनाओं को ‘टेक-फर्स्ट’ बना रहे हैं। जब युद्ध के लिए आपको बॉर्डर पर खड़े लाखों सैनिकों की जगह चंद कुशल ‘ड्रोन ऑपरेटर्स’ की जरूरत होगी, तो सरकार भारी-भरकम स्थायी फौज क्यों रखेगी? इसीलिए ‘अग्निवीर’ जैसी योजनाएं तकनीकी बदलाव की आहट हैं।
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भविष्य के युद्ध: जब खबरें आएंगी कि “भारत के 21 रोबोट शहीद हुए”
जरा कल्पना कीजिए, आज से 20-25 साल बाद का अखबार कैसा होगा? डॉ. दिव्यकीर्ती कहते हैं कि तब ऐसी खबरें आम होंगी— “कल सीमा पर भीषण झड़प हुई, जिसमें भारत के 21 बहादुर रोबोट शहीद हुए और हमने दुश्मन के 25 रोबोट्स को जमींदोज कर दिया।” सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन यह हकीकत बनने की राह पर है।

- रोबोटिक सेना: अब ऐसे ‘ह्यूमनॉइड’ (इंसान जैसे) रोबोट बन रहे हैं जिनकी आंखें कैमरा हैं। वे सामने वाले की वर्दी और चेहरे को स्कैन करके पलक झपकते ही पहचान लेंगे कि वह अपना है या पराया।
- रोबोटिक जानवर: सिर्फ इंसान क्यों? चार पैरों वाले कुत्ते जैसे रोबोट बन चुके हैं, जिन पर बंदूकें लगी हैं और वे उन पहाड़ों पर चढ़ सकते हैं जहाँ इंसान के पैर कांपते हैं। मक्खी और पक्षियों जैसे छोटे ड्रोन बन रहे हैं जो जासूसी करने में माहिर हैं।
- साइबर वॉरफेयर (Cyber Warfare): भविष्य में असली युद्ध कंप्यूटर स्क्रीन पर होगा। अगर हमने दुश्मन का जीपीएस (GPS) हैक कर लिया, तो उनकी करोड़ों की मिसाइलें ‘अंधी’ हो जाएंगी। उन्हें पता ही नहीं चलेगा कि गिरना कहाँ है।
- लेजर बीम टेक्नोलॉजी: इजराइल के ‘आयरन डोम’ की तरह अब ऐसी लेजर बीम्स पर काम हो रहा है जो आसमान से आती मिसाइल को हवा में ही जलाकर राख कर देंगी।
जब युद्ध इतना हाई-टेक होगा, तो सैनिकों की जरूरत कम होगी और विशेषज्ञों की ज्यादा।

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महत्वपूर्ण जानकारी: करियर और भविष्य
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क्या डॉक्टर और टीचर की नौकरी सुरक्षित है? (5+1 का मॉडल)
अक्सर छात्र पूछते हैं कि क्या AI डॉक्टर और टीचर को भी घर बैठा देगा? डॉ. दिव्यकीर्ती का मानना है कि ये नौकरियां खत्म नहीं होंगी, बल्कि इनका काम करने का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा। खासकर भारत के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ डॉक्टरों की भारी कमी है, वहां AI एक वरदान बनेगा।
उन्होंने एक शानदार “5+1 मॉडल” सुझाया है। समझिए इस टेबल के जरिए:
| कार्यक्षेत्र (Sector) | मनुष्य की भूमिका (Human Role) | रोबोट की भूमिका (Robot Role) |
| शिक्षा (Teaching) | मुख्य मार्गदर्शक (Main Mentor): बच्चों को नैतिकता सिखाना, सहानुभूति देना और जीवन के पाठ पढ़ाना। | 5-6 सहायक रोबोट: जो स्थानीय भाषा (जैसे झारखंड में ‘जोहार’ कहकर बात करना) में 24/7 डाउट सॉल्व करेंगे। |
| चिकित्सा (Medicine) | जटिल निर्णय: सर्जरी की निगरानी करना और मरीज को मानसिक ढांढस बंधाना। | सटीक ऑपरेशन: बिना हाथ कांपे सर्जरी करना और पूरी दुनिया की मेडिकल नॉलेज के डेटाबेस से तुरंत इलाज ढूंढना। |
| रक्षा (Defense) | कमान और नीति: युद्ध का फैसला लेना और मशीनों को कंट्रोल करना। | सीमा पर गश्त: ड्रोन, मक्खी रोबोट और रोबोट कुत्तों के जरिए हमला और जासूसी करना। |
डॉक्टर की जरूरत हमेशा रहेगी, क्योंकि मशीन के पास डेटा तो है, पर ‘सहानुभूति’ (Empathy) नहीं। रोबोट ऑपरेशन सटीक करेगा, लेकिन मरीज का हाथ पकड़कर यह कहने वाला कि “घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा,” एक इंसान ही होगा।
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सिविल सेवा (UPSC/PCS) और एआई का मुकाबला
UPSC, JPSC, BPSC या UPPCS की तैयारी करने वाले शेरों के लिए राहत की बात यह है कि अगले 15-25 सालों तक आपकी कुर्सी को बहुत बड़ा खतरा नहीं है। डॉ. दिव्यकीर्ती कहते हैं कि प्रशासन चलाना एक बहुत ही पेचीदा और मानवीय काम है, जिसे पूरी तरह मशीनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

लेकिन याद रहे, आप मानव इतिहास की पहली ऐसी पीढ़ी हैं जिसे मशीनों को हराना होगा। आपको पुराने ढर्रे से निकलकर तकनीक को अपना दोस्त बनाना होगा। अगर आप एक ‘डिजिटल एडमिनिस्ट्रेटर’ बनने को तैयार हैं, तो सिविल सेवा आपके लिए सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक करियर बना रहेगा।
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राज्य परीक्षाओं का ‘अजीब’ सिलेबस: क्या बनाने वाले नशे में थे?
विभिन्न राज्यों के सिलेबस पर चर्चा करते हुए डॉ. साहब ने बड़े ही मजाकिया लहजे में कहा कि कभी-कभी लगता है जैसे राज्य लोक सेवा आयोग के सिलेबस बनाने वालों ने उस दिन “भांग, महुआ या ताड़ी” का भारी सेवन किया था!
- झारखंड (JPSC): डॉ. साहब चुटकी लेते हुए कहते हैं कि यहाँ की परीक्षा तो तब होती है जब ‘भगवान चाहता है’। पिछले 10 साल में सिर्फ 3 बार परीक्षा हुई है! और सिलेबस? बनाने वाले ने सोचा होगा कि बच्चों को सब कुछ पढ़वा दो, कुछ भी मत छोड़ो।
- छत्तीसगढ़ (CGPSC): यहाँ तो नाम में ही ’36’ है, तो सिलेबस में 360 चीजें डाल दी हैं। छात्र बेचारे न्यूटन और आइंस्टीन बनते-बनते रह जाते हैं। फिलॉसफी से लेकर सोशियोलॉजी तक, सब कुछ ठूस दिया गया है।
- राजस्थान (RPSC): यहाँ भी सिलेबस की गहराई असीमित है। जो कुछ भी दुनिया में मौजूद है, वह राजस्थान के सिलेबस में मिल जाएगा।
डॉ. साहब का सार यह है कि अगर आप UPSC या किसी एक राज्य की तैयारी दिल से कर लेते हैं, तो आप लगभग हर राज्य की परीक्षा देने के काबिल बन जाते हैं। बस 2-3 महीने की एक्स्ट्रा मेहनत चाहिए होती है।

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भाषा की दीवार और आर्टिकल 16: जज्बे की कहानी
संविधान का अनुच्छेद 16 (Article 16) हमें यह सुरक्षा देता है कि कोई भी राज्य अपनी नौकरी सिर्फ अपने निवासियों के लिए ‘रिजर्व’ नहीं कर सकता। हालांकि, राज्य सरकारें ‘स्थानीय भाषा’ का रोड़ा अटकाकर बाहरी बच्चों को रोकने की कोशिश करती हैं, जो एक हद तक ठीक भी है क्योंकि एक अधिकारी को स्थानीय जनता की भाषा आनी चाहिए।
यहाँ डॉ. दिव्यकीर्ती एक प्रेरक कहानी सुनाते हैं। उनका एक स्टूडेंट, जो पूरी तरह हिंदी माध्यम का था और जिसे अंग्रेजी का ‘अ’ भी नहीं आता था, उसे IPS बनकर ‘तमिलनाडु’ कैडर मिला। वह बेचारा घबरा गया कि वहां कैसे सर्वाइव करेगा। लेकिन 3-4 साल बाद जब डॉ. साहब उससे मिले, तो वह वहां के स्थानीय लोगों से भी बेहतर तमिल बोल रहा था! उसने तमिल साहित्य तक पढ़ डाला।
सीख: भाषा कोई दीवार नहीं, बल्कि एक नया हुनर है। अगर आप सीखने को तैयार हैं, तो पूरा हिंदुस्तान आपका है।

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तैयारी का असली फायदा: “मेनुकी/तनुकी” रवैये से आज़ादी
सिविल सेवा की तैयारी का सबसे बड़ा फायदा सिर्फ नौकरी नहीं है। यह आपको एक ‘साधारण इंसान’ से एक ‘परिपक्व नागरिक’ बनाता है।
समाज में दो तरह के लोग होते हैं:
- मेनुकी/तनुकी (Menu-ki/Tanu-ki) वाले: पंजाबी में एक कहावत है— ‘मेनुकी’ (मुझे क्या?)। इजराइल-हमास लड़ रहे हैं— मेनुकी! घर में आग लगी है— तनुकी (तुझे क्या?)! ऐसे लोग अवेयरनेस के नाम पर शून्य होते हैं। उन्हें दुनिया की किसी भी हलचल से कोई फर्क नहीं पड़ता।
- जागरूक नागरिक: एक UPSC/PCS का छात्र जानता है कि अगर लाल सागर (Red Sea) में संकट है, तो उसके गांव में पेट्रोल के दाम क्यों बढ़ेंगे। उसे पता है कि झारखंड का तापमान क्यों बदल रहा है।

तैयारी आपको वह ‘दृष्टि’ देती है जिससे आप किसी भी गंभीर विषय पर ऐसी बात कर सकते हैं कि दुनिया आपको सुनना चाहे। यह सिलेबस आपको गढ़ता है, आपको एक सोचने-समझने वाला इंसान बनाता है।
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निष्कर्ष: डरो मत, खुद को बदलो
अंत में, डॉ. विकास दिव्यकीर्ती का यही संदेश है कि भविष्य “अजीब” जरूर है, लेकिन वह उन्हीं के लिए डरावना है जो बदलने को तैयार नहीं हैं। एआई (AI) लाखों नौकरियां खत्म करेगा, लेकिन वह उन लाखों ‘नए अवसरों’ को भी जन्म देगा जिन्हें सिर्फ एक जागरूक और मेहनती इंसान ही पकड़ पाएगा।
भारत के छोटे शहरों और कस्बों से आने वाले युवाओं में जो ‘लड़ने का जज्बा’ है, वह किसी भी रोबोट के पास नहीं है। रोबोट के पास डेटा का अंबार हो सकता है, लेकिन आपके पास ‘विवेक’ (Wisdom) और ‘सहानुभूति’ (Empathy) है। अपनी तैयारी जारी रखें, तकनीक के साथ कदमताल करें और याद रखें कि इतिहास गवाह है—जीता वही है जिसने वक्त से पहले खुद को बदल लिया। डरो मत, डटे रहो!

Q1. क्या AI सच में नौकरियां खत्म कर देगा?
नहीं, AI कुछ पारंपरिक नौकरियां कम करेगा लेकिन नई तकनीकी और क्रिएटिव नौकरियां भी पैदा करेगा।
Q2. कौन-सी नौकरियां सबसे ज्यादा सुरक्षित रहेंगी?
डॉक्टर, शिक्षक, प्रशासनिक सेवाएं और ऐसी नौकरियां जिनमें निर्णय क्षमता और सहानुभूति जरूरी है।
Q3. क्या UPSC की तैयारी करने वालों को डरना चाहिए?
नहीं, प्रशासनिक काम पूरी तरह मशीन नहीं कर सकती। लेकिन डिजिटल स्किल सीखना जरूरी होगा।
Q4. क्या भविष्य में युद्ध रोबोट लड़ेंगे?
काफी हद तक हाँ। ड्रोन, साइबर वारफेयर और ऑटोमेटेड सिस्टम युद्ध का बड़ा हिस्सा बनेंगे।
Q5. छात्रों को अभी क्या करना चाहिए?
AI टूल सीखें, टेक्नोलॉजी से दोस्ती करें और लगातार स्किल अपडेट करते रहें।

Yogesh banjara AI Hindi के Founder & CEO है | अगर आपको AI से अपनी life को EASY बनाना है तो आप हमारी site ai tool hindi पर आ सकते है|
